मुस्लिम समाज में कितने सफल हुए मोदी सरकार के ‘सबका विश्वास’ के प्रयास? – Modi government muslim sabka sath sabka vishwas narendra modi kashmir delhi

  • मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल को एक साल
  • मुस्लिम समुदाय के लिए दिया था विश्वास का नारा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2019 में शुरू हुए दूसरे कार्यकाल को एक साल पूरा हो गया है. मोदी जब पहली बार पीएम बने थे तो उन्होंने सबका साथ-सबका विकास का नारा दिया था. दूसरी बार सत्ता संभालने पर उन्होंने इसे आगे बढ़ाते हुए इसमें ‘सबका विश्वास’ भी जोड़ दिया. आज मोदी सरकार 2.0 के एक साल पूरे होने के बाद ये देखना जरूरी है कि केंद्र अपने इस नए लक्ष्य में कितना सफल हुआ. अल्पसंख्यक खासकर मुस्लिम तबके का विश्वास उसने कितना जीता?

पिछले 12 महीनों की घटनाएं देखें तो मोदी सरकार के पहले पांच साल के मुकाबले दूसरे कार्यकाल के पहले एक साल में मुस्लिम समाज सरकार से ज्यादा रूठा दिखता है. इसकी वजह भी है. मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में मॉब लिंचिंग और गौरक्षकों के उत्पात जैसी घटनाएं देखने को मिलीं. इन्हें लेकर केंद्र सरकार को घेरने की कोशिशें भी हुईं. हालांकि सरकार और बीजेपी की ओर से हमेशा ऐसी घटनाओं को कानून व्यवस्था का सवाल बताकर किनारे कर दिया गया. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त 2016 के एक कार्यक्रम में कहा था कि अधिकतर गौरक्षक असामाजिक तत्व हैं जिन्हें सजा दी जानी चाहिए.

पांच साल बनाम एक साल

हालांकि मोदी सरकार का दूसरा कार्यकाल इस मायने में काफी अलग रहा. इसकी शुरुआत 2019 के चुनावों से ही मानी जा सकती है. जब मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से बीजेपी ने मालेगांव धमाके की आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिह को टिकट देकर मैदान में उतारा. पार्टी का ये कदम उसके समर्थकों के लिए भी हैरान करने वाला था. प्रज्ञा सिंह तभी से अपने बयानों के चलते पार्टी और सरकार के लिए सिरदर्द बनी हुई हैं और पीएम मोदी को उन्हें लेकर यहां तक कहना पड़ा कि वो उन्हें कभी दिल से माफ नहीं कर पाएंगे.

मोदी सरकार 2.0: एक साल में हासिल कीं ये पांच बड़ी उपलब्धियां

लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है. तीन तलाक को लेकर मोदी सरकार का जो रुख रहा उसे मुस्लिम समाज ने संदेह की निगाह से देखा. तीन तलाक को खत्म करने का फैसला सुप्रीम कोर्ट का था. कोर्ट ने ही सरकार को इस बारे में कानून बनाने को कहा लेकिन केंद्र सरकार ने कानून बनाकर इसे अपराध घोषित कर दिया. तीन तलाक देने पर सजा का प्रावधान भी किया गया. मुस्लिम समाज ने इसे अपने धार्मिक मामलों में दखल के रूप में देखा. हालांकि केंद्र सरकार लगातार दावा करती रही है कि ये कानून मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए है और मुस्लिम समाज के भले के लिए है.

कश्मीर का विभाजन और नेताओं की हिरासत

अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने अचानक कश्मीर को लेकर धारा 370 के प्रावधान निष्प्रभावी कर दिए. फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती जैसे दिग्गज कश्मीरी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. जम्मू-कश्मीर का विभाजन कर दिया गया. लद्दाख से उसे अलग कर कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया. कश्मीरियों पर सरकारी बंदिशों का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उछला. जम्मू कश्मीर भारत का एक मात्र मुस्लिम बहुल राज्य है. वहां सरकार के एक्शन को मुस्लिम तबके में बहुत स्वागतयोग्य नहीं माना गया. हालांकि मोदी सरकार कहती रही कि 370 हटाने का वादा उसके चुनावी घोषणा पत्र का हिस्सा रहा है और उसने जनता से किया अपना वादा ही निभाया है.

s_052820020402.jpg

सीएए-एनपीआर और एनआरसी

दिसंबर में सरकार नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए लेकर आई. इसका देशभर में विरोध हुआ. कुछ जगह खासकर यूपी में विरोध प्रदर्शन ने हिंसक रूप भी ले लिया. इस हिंसा को लेकर राज्य की योगी आदित्यनाथ सरकार ने जो एक्शन लिया उसने दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा. खासकर पुलिस की गोली में मुस्लिम युवकों के मारे जाने, बड़ी संख्या में लोगों को वसूली के नोटिस मिलने और चौराहों पर उनके पोस्टर टांग देने की घटनाएं ऐसी थीं जिससे अल्पसंख्यक तबके में भय का माहौल दिखा.

सीएए के खिलाफ राजधानी दिल्ली में शाहीन बाग का धरना हुआ तो मोदी सरकार का कोई नुमाइंदा उनसे बातचीत तक करने या उन्हें आश्वासन देने नहीं गया. दिल्ली चुनावों में शाहीन बाग की तुलना बीजेपी नेताओं ने पाकिस्तान तक से की. मोदी सरकार के एक मंत्री ने देश के गद्दारों को गोली मारने के नारे लगवाए लेकिन केंद्र सरकार के अधीन दिल्ली पुलिस मूकदर्शक बनी रही. दिल्ली चुनाव के बाद राजधानी दिल्ली ने दंगे भी देखे. बड़ी संख्या में लोगों की हत्याएं हुईं, उनके घर-दुकान चला दिए गए. लेकिन जहरीले बोल वाले नेताओं पर कोई कार्रवाई नहीं की गई.

मोदी सरकार 2.0 : केंद्र में मिली जीत, फिर पलट गई इन दो बड़े राज्यों में सत्ता

समाज में अविश्वास की खाई इस कदर चौड़ी हो गई कि कोरोना संकट के बीच जब तबलीगी जमात का केस सामने आया तो कोरोना जिहाद के मैसेज की सोशल मीडिया पर बाढ़ आ गई. कोरोना के चलते शाहीन बाग का प्रोटेस्ट भले ही खत्म हो गया हो लेकिन सीएए, एनपीआर और एनआरसी को लेकर मुस्लिम तबके की चिंताएं जस की तस हैं.

पीएम मोदी कई बार कह चुके हैं कि जो हिंदुस्तान की मिट्टी के मुसलमान हैं, उनसे सीएए, और एनआरसी का कोई लेना-देना नहीं है. एनआरसी को लेकर तो अभी सरकार में कोई जिक्र ही नहीं है. लेकिन अमित शाह का संसद में दिया गया वो बयान भी रिकॉर्ड पर है जिसमें उन्होंने कहा था कि एनआरसी पूरे देश में लागू किया जाएगा. एनपीआर के तहत लोगों से उनके माता-पिता का जन्मस्थान पूछने से आशंकाएं बढ़ी हैं. कुल मिलाकर सरकार अल्पसंख्यक तबके को ऐसा कोई भरोसा देने में विफल रही जो एनआरसी को लेकर उनकी चिंताओं को दूर कर सके.

सरकार और मुसलमानों के बीच खाई की बात वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश उर्मिल न सिर्फ स्वीकारते हैं बल्कि इसे और आगे ले जाते हैं. उर्मिलेश कहते हैं कि बात सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय तक सीमित नहीं है, मौजूदा सरकार हर उस तबके को नहीं अपनाना चाहती जो वैचारिक तौर पर बीजेपी से अलग हों.

वहीं, वरिष्ठ पत्रकार यूसुफ अंसारी कहते हैं, ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास…एक अच्छा नारा था, इससे उम्मीद जगी थी. लेकिन ये नारा खोखला साबित हो गया. मोदी सरकार आरएसएस के शुरुआती एजेंडे पर आगे बढ़ रही है जिसमें मुसलमानों के अधिकार कम करने की सोच है. सरकार ने ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं जिससे मुस्लिमों के प्रति समाज के दूसरे तबके में नफरत पैदा हो गई.’

गौरतलब है कि हाल ही में दिल्ली से लेकर देश के दूसरे राज्यों से ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जिनमें मुस्लिम सब्जी वालों, फलों वालों से उनका नाम-मजहब पूछा गया और उनके साथ मार-पिटाई की गई. आधार कार्ड मांगकर कॉलोनियों में एंट्री दी गई. मुस्लिम डिलीवरी ब्वॉय से सामान नहीं लिया गया या मुस्लिम ड्राइवर का नाम देखकर कैब कैंसिल कर दी गई.

मोदी सरकार 2.0 के एक साल: 12 महीने में लिए गए 12 बड़े फैसले

इस मसले पर aajtak.in ने मशहूर कारोबारी और राजनीतिक विश्लेषक जफर सरेशवाला से भी बात की. जफर सरेशवाला उन लोगों में शामिल हैं, जिन्हें पीएम मोदी के करीबी के तौर पर जाना जाता है. जफर सरेशवाला का मानना है कि तमाम मुद्दों पर मुस्लिम समुदाय के बीच सरकार का भरोसा डगमगाया है, लेकिन इसका रास्ता भी निकालना पड़ेगा. सरेशवाला ने कहा कि हाल ही में जब कोरोना और तबलीगी जमात का मामला चर्चा में आया तो सरकार इस पर एक्टिव नजर आई.

सरेशवाला के मुताबिक एनएसए अजित डोभाल और मौलाना साद के बीच मुलाकात भी सरकार की एक कोशिश का ही नतीजा था. जफर सरेशवाला ने कहा कि 20-25 करोड़ आबादी वाले समुदाय से अगर सरकार बात न करे और इतना बड़ा समुदाय भी सरकार से संपर्क न करे तो ये देश के लिए अच्छा नहीं है. लिहाजा, मुस्लिम समुदाय और सरकार के बीच बातचीत का रास्ता ही तमाम दूरियों को खत्म कर सकता है, इसलिये बातचीत की प्रक्रिया आगे बढ़ानी होगी.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें

  • Aajtak Android App
  • Aajtak Android IOS



Source link

Related posts

Leave a Comment