बच्चों ने पिता से किया मकान का वादा, काम नहीं मिला तो 28 दिन में बना दीं 22 हजार ईंटें – Lockdown siblings father to make house promise wages made thousands of bricks at home tstn

  • पिता से किया था मजदूरी कर घर बनाने के पैसे देने का वादा
  • लॉकडाउन के कारण नहीं मिली कमाई के लिए मजदूरी

कहते है जब कुछ करने का जज्बा हो तो मंजिल जरूर मिल जाती है. ऐसा ही उदाहरण मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में देखने को मिला जहां बच्चों ने अपने माता-पिता से मकान बनवाने का वादा किया था. लेकिन लॉकडाउन की वजह से उन्हें कहीं भी काम नहीं मिला. जिसके बाद पिता के सपने को पूरा करने के लिये भाई-बहनों ने मिलकर अपने हाथों से हजारों ईंटें बना डालीं. इसके लिए बच्चों ने पहले ईंट बनाना भी सीखा. इस तरह से उन्होंने ईंट खरीद में खर्च होने वाली मोटी रकम लगभग एक लाख रुपयों की भी बचत कर ली.

ये मामला रतलाम जिले के आदिवासी अंचल रावटी के मजरा दर्जन पाड़ा का है. जहां एक परिवार में चार भाई-बहनों ने लॉकडाउन में अपना घर बनाने के लिए 28 दिन में 22 हजार ईंटें बनाईं. भाई-बहन पढ़ते हैं और पढ़ाई के बाद उन लोगों ने माता-पिता से छुट्टियों में मजदूरी कर पैसा कमाकर मकान निर्माण का वादा किया था, लेकिन लॉकडाउन में मजदूरी नहीं मिली तो उन्होंने घर पर ही ईंटें बनाने का काम किया.

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12वीं तक पढ़े प्रेमचंद दामा और आठवीं पास सूरज बाला दामा की बेटियां छाया (बीएससी प्रथम वर्ष), वर्षा (10वीं), अमीषा (10वीं) और बेटा विकास (बीए प्रथम वर्ष) में हैं. वे पक्का मकान बनाने की जिद तीन साल से कर रहे हैं. प्रेमचंद की साढ़े चार बीघा जमीन से आमदनी इतनी नहीं होती कि घर का खर्च और बच्चों की परवरिश के अलावा घर बनाने के लिए बचत कर पाएं. चारों भाई-बहनों ने दीपावली पर माता-पिता से वादा किया था कि इस साल छुटि्टयों में मकान बनाने के लिए शहर जाकर मजदूरी करेंगे और 50 हजार रुपये लाकर देंगे जिससे पक्का घर बनवाएंगे.

कोरोना संक्रमण में लॉकडाउन के चलते स्कूल-कॉलेज से लगाकर सभी काम धंधे ठप हो गए. प्रेमचंद ने पीएम आवास योजना के लिए पंचायत में साल भर पहले आवेदन किया था, लेकिन राशि स्वीकृत नहीं हुई. बचपन से शिक्षक मुकेश राठौर से पढ़ाई में सलाह लेने वाले चारों भाई-बहनों ने मकान की समस्या उन्हें बताई. उन्होंने तय किया कि मजदूरी के बजाय घर पर ही ईंटें बनाई जाएं.

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भाई-बहनों ने ईंट भट्टों पर काम करने वाले गांव के परिचितों से ईंट बनाने की तकनीक सीखी और खेत से निकले 17 क्विंटल गेहूं में से कुछ गेहूं बेचकर ट्रैक्टर से मिट्टी मंगवाई. रोज 7 से 8 घंटे मेहनत कर 28 दिन में मकान के लिए 22 हजार ईंटें बनाकर भट्टा तैयार किया और अपना आशियाना बनाने के लिए जरूरत की ईंटें बना दीं. अब मकान के लिए बाकी सामग्री बारिश के बाद ही जुटा पाएंगे. बारिश के बाद होने वाली फसल को बेचकर राशि मिलेगी उससे अन्य सामग्री खरीदी जाएगी और फिर बनेगा विकास और छाया के सपनों का आशियाना और पिता से किया गया वादा भी पूरा हो सकेगा.

विकास ने बताया कि हमने ठाना था कि मकान बनाएंगे, हमने ईंट बनाना तय किया. इसके लिए गांव में जो ईंट बनाते थे उनको बुलाकर काम सीखा फिर सामग्री जुटाई. घर में रखा गेहूं बेचा और मिट्टी लाए. फिर ईंट बनाना शुरू किया. हम एक दिन में सौ से हजार ईंट बना लेते थे. हमने 28 दिन में 22 हजार ईंट बनाईं जिनकी कीमत करीब लाख रुपये है.

ईंट बनाने की सलाह देने वाले टीचर मुकेश राठौर का कहना है कि यह परिवार काफी समय से परिचित हैं. इस परिवार के बच्चों को मैंने ही पढ़ाया है. बच्चों के पिता मुझसे आकर मिलते रहते थे. उन्होंने मुझसे मकान के लिए कहा था. तो मैंने उनसे कहा कि लॉकडाउन के कारण कहीं मजदूरी करने तो जा नहीं सकते हो. तो कुछ ऐसा करो कि समाज के लिए प्रेरणा बन जाये. मैंने उनको सलाह दी कि मकान के लिए पहले ईंट बना लो फिर मिट्टी डलवाई गई और आज इस परिवार के बच्चों ने मात्र एक महीने में ईंट का पूरा भट्टा खड़ा कर दिया. सभी बच्चे बड़े प्रतिभावान हैं.

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